शुक्रवार, 8 मई 2009

भीगी पलकों व कापतं हाथों से पुत्री ने दी मुखाग्नि

रायपुर। कुदरत भले ही गुडिय़ा अनमोल से खफा रही हो और तीन वर्ष की ही उम्र में पिता का साया छीन लिया हो। क्रूर नियति ने उसकी एक मात्र सहारा माता को भी छीन लिया, लेकिन इन सब बज्रघातों के बावजूद मात्र तेरह वर्षीय अनमोल ने हार नहीं मानी। मां की आकस्मिक मौत के बाद उनकी इच्छा को पूरी करने की बात आई तो उसने भीगी आंखों और कांपते हाथों व फौलादी हौसलों के साथ मां को मुखाग्रि दी, और समूची महिला समाज के सामने मिशाल बन गई। जानकारी के अनुसार मौदहापारा निवासी चंदरलाल कृष्णानी के यहां लगभग तेरह वर्ष पूर्व बालिका अनमोल का जन्म हुआ। जन्म के तीन वर्ष बाद ही मौत के क्रूर पंजों ने उसके पिता चंदर लाल को छीन लिया। तीन वर्षीय मासूम अनमोल व उसकी मां श्रीमती लतादेवी कृश्णानी अकेले रह गए। लतादेवी ने हार न मानकर पुत्री अनमोल को बेहतर परवरिश दी। वे अक्सर मौत के बाद अनमोल से मुखाग्रि देने की बात कहा करती थीं। समय का चक्र घूम कर वहां आ गया जहां लतादेवी को दुनिया से विदा होना था और सोमवार अपरान्ह तीन बजे अचानक बे्रन हेमरेज से उनकी मृत्यु हो गई। अनमोल के सिर से पिता का साया तो पहले ही उठ गया था, मां के आंचल को भी विधाता ने छीन लिया। बालिका अनमोल पर हुए इस बज्रघात से रिश्तेदार, समाज सहित जानने पहचानने वाले सभी दुखी थे। लेकिन सिवाय दुख मनाने के कुछ किया भी नहीं जा सकता था। मौत के बाद जब लतादेवी के अंतिम संस्कार का वक्त आया तो सभी को लता देवी की पुृत्री द्वारा मुखाग्रि देने की इच्छा का ध्यान आया और शरस्वती शिशु मंदिर में माध्यमिक खंड में अध्यनरत अनमोल से बात की गई। मुखाग्नि देने से जहां बड़े बुजुर्ग तक पीछे हट जाते हैं वहीं अनमोल ने दिल में फौलाद संजोते हुए मां की इच्छा पूरी करते हुए मारवाड़ी श्मसान घाट में समाज के लोगों के सामने मुखाग्रि दी। अनमोल ने आंसुओं के साथ बात करते हुए कहा कि मां की यही इच्छा थी इसलिए उसने भी बिना भय के उसे पूरा किया है। मां की आत्मा को तो निश्चित ही शांति मिली होगी और समाज के लिए अनुकरणीय उदाहरण पेश करने वाली अनमोल भी अपने फौलदी इरादों से जीवन के संघर्ष में विजेता बनकर उभरेगी। विधाता द्वारा दिये जाने वाले बज्रघात भी कुछ ऐसे ही इशारे कर रहे हैं।